Home » Dharam » पाकिस्तान में भी है शक्ति पीठ

कहते हैं हिंदू गंगाजल में स्नान करें या मद्रास के मंदिरों में जप करें, वह अयोध्या जाए या उत्तरी भारत के मंदिरों में जाकर पूजा-आर्चना करें। यदि उसने हिंगलाज की यात्रा नहीं की तो उनकी तीर्थों की यात्रा अधूरी है। हिंगलाज में हर साल मार्च में हजारों हिंदू पहुंचते हैं और तीन दिनों तक जप करते हैं। माता का एक शक्तिपीठ जिसकी पूजा मुसलमान भी करते हैं यह शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य में स्थित है। 


मुसलमान देवी हिंगलाज को नानी का मंदिर और नानी का हज भी कहते हैं। इस स्थान पर आकर हिंदू और मुसलमान का भेद भाव मिट जाता है। दोनों ही भक्ति पूर्वक माता की पूजा करते हैं। यहां पास में ही हिंगला नदी प्रवाहित होती है। माता का यह मंदिर हिंगलाज देवी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के चक्र से कटकर यहां पर देवी सती का सिर गिरा था। इसलिए यह स्थान चमत्कारी और दिव्य माना जाता है। 
 
ज्योति के दर्शन

इस शक्तिपीठ में ज्योति के दर्शन होते हैं। गुफा में हाथ व पैरों के बल जाना होता है। 
 
मंदिर से जुड़ी मान्यताएं- हिंगलाज देवी शक्तिपीठ के विषय में ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि जो एक बार माता हिंगलाज के दर्शन कर लेता है। उसे पूर्वजन्म के कर्मों का दंड नहीं भुगतना पड़ता है। मान्यता है कि परशुराम जी द्वारा 21 बार क्षत्रियों का अंत किए जाने पर बचे हुए क्षत्रियों ने माता हिंगलाज से प्राण रक्षा की प्रार्थना की। माता ने क्षत्रियों को ब्रह्मक्षत्रिय बना दिया। इससे परशुराम से उन्हें अभय दान मिल गया।


एक मान्यता यह भी है कि रावण के वध के बाद भगवान राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान राम ने भी हिंगलाज देवी की यात्रा की थी। राम ने यहां पर एक यज्ञ भी किया था। माता हिंगलाज माता वैष्णों की तरह एक गुफा में विराजमान हैं। 
 
कैसी है यात्रा
हिंगलाज माता मंदिर जाने के लिए पासपोर्ट और वीजा जरूरी है। हिंगलाज की यात्रा कराची से प्रारंभ होती है। कराची से लगभग 10 किलोमीटर दूर हॉव नदी है। मुख्य यात्रा वहीं से शुरू होती है। हिंगलाज जाने के पहले लासबेला में माता की मूर्ति का दर्शन करने होते हैं। यह दर्शन छड़ी वाले पुरोहित कराते हैं। वहां से शिवकुण्ड (चंद्रकूप) जाते हैं, जहां अपने पाप की घोषणा कर नारियल चढ़ाते हैं। जिनकी पाप मुक्ति हो गई और दरबार की आज्ञा मिल गई। उनका नारियल और भेंट स्वीकार हो जाती है।
 
चंद्रकूप- हिंगुलाज को आग्नेय शक्तिपीठ तीर्थ भी कहते हैं, क्योंकि वहां जाने से पहले अग्नि उगलते चंद्रकूप पर यात्री को जोर-जोर से अपने गुप्त पापों का विवरण देना पड़ता है। साथ ही, भविष्य में उन पापों को न दोहराने का वचन भी देना पड़ता है। जो अपने पाप छिपाते हैं, उन्हें आज्ञा नहीं मिलती और उन्हें वहीं छोड़कर अन्य यात्री आगे बढ़ जाते हैं। इसके बाद चंद्रकूप दरबार की आज्ञा मिलती है। चंद्रकूप तीर्थ पहाडिय़ों के बीच में धूम्र उगलता एक ऊंचा पहाड़ है। वहां विशाल बुलबुले उठते रहते हैं। आग तो नहीं दिखती, लेेकिन अंदर से यह खौलता, भाप उगलता ज्वालामुखी है।

 

अंतिम पड़ाव-मां की गुफा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच कर यात्री विश्राम करते हैं। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व अघोर नदी में स्नान करके पूजन सामग्री लेकर दर्शन हेतु जाते हैं। नदी के पार पहाड़ी पर मां की गुफा है। गुफा के पास ही अतिमानवीय शिल्प-कौशल का नमूना माता हिंगलाज का महल है, जो यज्ञों द्वारा निर्मित माना जाता है। एक नितांत रहस्यमय नगर जो प्रतीत होता है, मानों पहाड़ को पिघलाकर बनाया गया हो।



हवा नहीं, प्रकाश नही, लेकिन रंगीन पत्थर लटकते हैं। वहां के फर्श भी रंग-बिरंगे हैं। दो पहाडिय़ों के बीच रेतीली पगडंडी। कहीं खजूर के वृक्ष, तो कही झाड़ियों के बीच पानी का सोता। उसके पार ही है मां की गुफा। कुछ सीढ़ियां चढ़कर, गुफा का द्वार आता है। इस विशालकाय गुफा के अंतिम छोर पर वेदी पर दिया जलता रहता है। यहां कोई मूर्ति नहीं है हां पिण्डी जरूर हैं। मां की गुफा के बाहर विशाल शिलाखण्ड पर, सूर्य-चन्द्रमा की आकृतियां अंकित हैं। कहते हैं कि इन आकृतियों को राम ने यहां यज्ञ के बाद खुद अंकित किया था।

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