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Danger of nuclear war illustration with multiple explosionsविश्वयुद्ध के घुमड़ते़ बादल

                           यदि हम अपने मोहल्ले, कस्बे शहर देश की समस्याओं के इतर विश्व में चल रहे घटना क्रमों पर एक विहंगम दृष्टिपात करें एंव घट रही घटनाओं को विश्लेषित करने का प्रयत्न करें तो हम पाऐंगे कि द्वितीय विश्वयुद्ध से  पहले (1933-39) वाली स्थितियों का निर्माण हो रहा है। देशों के समूह बन रहे हैं, एक दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना भरती जा रही है, बातचीत के रास्ते हल निकालने की संभावनाएं क्षींण पड़ती जा रही हैं, विश्व संस्थाए जैसे यू.एन. अपनी सार्मथ्य खोती जा रही है, समस्याओं के हल शांतिके स्थान पर युद्ध में खोजे जा रहे हैं।

       द्वितीय विश्वयुद्ध के यदि कारणों को विश्लेषित किया जाए तो हम पाते हैं कि एक तरफ अमेरिका भयानक आर्थिक मंदी (1930 का दशक) के दौर से गुजर रहा था, दूसरी तरफ जर्मनी भी प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात थोपी हुई संधियों यथा पेरिस संधि (1923) एवं उससे होने वाले आर्थिक एंव राष्ट्रीय स्वावलंवन के हरण का दंश झेल रहा था। अपने स्त्रोतों के विकास के लिये जर्मनी अन्य देशों के उन्नत स्त्रोतों की तरफ तक रहा था,ऐसी अवस्था में हिटलर ने यहूदी द्वेष की नकली विचारधारा को हवा दे, जर्मनी के साम्राज्यवादी, धनाढय वर्ग के मिलकर आते राष्ट्रवाद के नारे तले यूरोप मे युद्ध का बिगुल बजा दिया। इस युद्ध का सबसे बड़ा फायदा अमेरिका को मिला जहां युद्ध से अमेरिकी फौजी साजो समान निर्माताओं की पौ-बारह हो गई, अमरिकी  अर्थव्यवस्था पुनः पटरी पर आ गई एंव युद्ध के पश्चात इंग्लैण्ड को तख्तोंताज से उतार अमरीका विश्व की महाशक्ति के रूप में उभरा।

1950 से 2016 तक  अमरिकी साम्राज्यवाद ग्यारह बार अर्थिक मंदी की उलटफेर का शिकार हुआ जिसमे सबसे बड़ी 2008 की आर्थिक मंदी थी! इन सभी आर्थिक मंदियों का समाधान विश्व के अन्य देशों में फैले हुए प्राकृतिक स्त्रोतों पर कब्जा  करने एवं सॉम्यवादी विचारधारा के प्रसार को रोकेने के लिये अनेकानेक कारण ढुंढकर सीधे अथवा परोक्ष युद्धों में फलित हुआ | चाहे वियतानाम युद्ध हो अथवा अफगानिस्तान, ईराक, लीबिया, दक्षिण अमेरिका मे निकारागुआ, चिली आदि सरकारों का तख्ता पलट-सभी के पीछे अमरीकी अर्थव्यवस्था जो कि विशालकाय बहुदेशीय, अर्न्तराष्ट्रीय कारपोरेटों से संचालित होती है उसको ताकत देने के लिए एंव उनके द्वारा विश्व में एक क्षत्र वर्चस्व बनाए रखने की जद्दो जहद का ही हिस्सा है!

        1970 के दशक में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के द्वारा अमरीकी डॉलर का मुल्यांकन सोने से हटाकर पेट्रोलियम के साथ स्थापित कर दिया गया। इस परिवर्तन से समस्त संसार के पेट्रोलियम की खरीदी-बेच डॉलर आधारित व्यवस्था कर दी गई समस्त विश्व के तेल उत्पादक देशों पर कड़ी निगाह कर दी गई जिससे वो देश डॉलर की गिरफ्त से बाहर न जा पायें। सउदी अरब में अमरीकी कठपुतली सरकार स्थापित की गई सद्दाम हुसैन अथवा गद्दाफी जिन भी शासको ने अपने तेल को डॉलर के बाहर किसी अन्य मुद्रा में  बेचने का प्रयास किया उन्हें किसी न किसी बहाने से हटा दिया गया।

           विरोधाभास का र्निमाण रूस एंव चीन, इन उभरती हुई महाशक्तियों ने अमेरिका के इस खेल को पहचाना। चीन ने आर्थिक उन्नति एंव अपने निर्यात को यूरोप एंव अमेरिका में बढ़ाया एवं अमरीकी डॉलरों को खरीद कर (ट्रेजरी बोन्ड खरीद के रास्ते) स्वयं को ताकतवर बनाया, वहीं रूस ने पुतिन के राष्ट्रपति बनने के पश्चात् (2003-आज तक) अपनी परमाणु शक्ति, हवाई एवं थल सैना के आधुनिकीकरण पर विशेष बल दिया। आज की स्थिति में रूस एवं चीन इस अवस्था में है कि वो अमरीका को आर्थिक एंव सैन्य दोनों क्षेत्रो में प्रबल चुनौती दे सकते है।

             अमरीका एंव उसके यूरोपीय मित्र देश जो कि अमरीकी पूंजीवाद एवं अमरीकी विदेश नीति को पूरी तरह से अंगीकार कर चुके है, उन्होंने रूस एवं चीन की बढ़ती ताकत एवं उससे साम्राज्यवादी शक्तियों को होने वाले खतरो को भापा । इसके चलते जहॉं संभव हुआ वहॉं उन देशों का विरोध होने का सिलसिला चल निकला। रूस के उपर यूक्रेन में हस्तक्षेप का बहाना ढूंढ कर व्यापार प्रतिबंधों की बाढ़ लगाई, वहीं दक्षिण चीनी समुद्र पर चीनी वर्चस्वता के खतरे को आधार मानकर जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशियां, आस्ट्रेलिया आदि देशों की मदद से घेराबंदी का कार्य प्रारंभ कर दिया।

           आज के दिन विश्व में इन शक्तियों के खेमे अपने वैचारिक एंव वैश्विक हितो के चलते एक दूसरे के सामने आ खड़े हुये है। कुछ प्रमुख विरोधाभासों को हम निम्नॉंकित रूपों में उल्लिखित कर सकते है |

(क)         धार्मिक विरोधाभासः- यथा शिया-सुन्नी सर्मथक एवं उनको पोषित करने वाले देश जैसे ईरान, सउदी अरब, सऊदी अरब-सीरिया आदि |   (ख)          इस्लाम-पश्चिमी मूल्यः यथा इस्लाम धर्म के मुल्यो की पश्चिम जगत के विकासशील मानव मूल्यों के बीच लड़ाई जिसकी परिणिती यूरोप, रूस आदि में होने वाले आतंकी धमाको में दिखाई देती है |                   (ग)           इस्लाम – इतर इस्लामिक धर्म यथा ईसाई, हिन्दू, बोद्ध धर्म जिसके मूल में एक ईश्वर, निराकार बनाम बहु ईश्वर, बहु प्रतिमा, बहु-सत्य, एवं साकार पूजा के बीच चलने वाला द्वंद है |                            (घ)             पारंपरिक स्त्रोतों के वर्चस्व का द्वंदः- इन स्त्रोतों में उर्जा (पेट्रोलियम एवं गैस) प्रमुख है, एवं इन स्त्रोतों पर कब्जे के लिए पूंजीवादी ताकते नव-साम्राज्यवादी धड़े के साथ मिलकर अन्य विरोधाभासो के तले जैसे धार्मिक विरोधाभास जो उपर बताये गये है अथवा डेमोक्रेसी-डिक्टेटर शिप विरोधाभास आदि इन स्थानो को, देशों को, समुन्द्रों को अपने अधिकार क्षेत्र में लेने के संघर्ष का कारण देखते है |

(च)              इनमें  समाजवाद-साम्राज्यवाद एंव ग्लोबालिजिम-टेरीटोरि येलिज्म प्रमुख है (नवउदारवादी वैश्विक अर्थिक व्यवस्था भौगोलीय क्षैत्रक आर्थिक व्यवस्था) इस विचारधारा अधारित विरोधाभास के मूल में विकास की अवधारणा के कारक तत्व है जिसमें व्यक्तिवाद बनाम साम्यवाद प्रमुख है।

              घुमड़ती घटायेः-   उपरोक्त उल्लेखित समस्त विरोधाभस आज समुचे विश्व में अपने उत्कर्ष में हमारे सामने मौजूद है एंव दो-दो हाथ करने के लिए तत्पर ही नहीं अपितु उद्दत दिखाई देते है विश्व युद्ध के लिए आज केवल एक चिंगारी की दरकार है, वो चिंगारी, कही भी, कभी भी, मानवीय अथवा मशीनी मूल से पैदा हो सकती है। केवल एक चिंगारी एंव समस्त विश्व में उसका फैलाव। कहॉ पैदा हो सकती है वो चिंगारी?                            (क)          सीरिया-यहाँ अमरीका के झंडे तले एक तरफ सउदी अरब तुर्की, इज़राइल, कतर, यूरोपियन देश(इंलैन्ड, फ्रान्स, जर्मनी प्रमुख) एंव आई.एस.आई.एस (जी हां आई.एस.आई.एस यहां सुनो इस्लाम के झंडे तले सउदी अरब द्वारा संचालित एंव पश्चिमी पूंजीवादी देशों द्वारा पोषित है) खड़े है तो दूसरी तरफ रूस, सीरिया, ईरान, हिजबुल्ला की ताकत है। अमरीका एंव रूस में संवाद की संभावनाए क्षीण हो चली है सीरिया की रूस सर्मथित फौज जीत की अग्रसर है और मह सउदी अरब एंव अमरीकी साम्राज्यवाद को कतई मंजूर नहीं है। सीरिया के राष्ट्रपति असद को हटाना उनका घ्येय है। उसके चलते अमरीका-रूस में सीधे लड़ाई की संभावना अपने ज्वलनशील बिन्दू तक आ चुकी है | कोई भी मानवीय अथवा मशीनी मूल युद्ध का कारण प्रदान कर सकती है |         (ख)          दक्षिणी चीन सागर यहां उत्तरी कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को रोकने एंव चीन द्वारा दक्षिणी चीन सागर पर अपना अधिपत्य के दावे पर, अमरीका ने दक्षिण कोरिया में मिसाईलें स्थापित कर दी है ,जापान एंव चीन के राजनैतिक एंव कूटनितिक संबंधों में तनाव पैदा होगया है, अमरीकी बैड़े योद्धाभास में जुटे है।एक संदेहास्पद कदम युद्ध की चिंगारी का काम कर सकता है |

(ग)              यूक्रेन यहां रूस के हस्तक्षेप के बहाने, रूस पर अनेकानेक राजनैतिक एंव आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये गये है, यूक्रेन की पश्चिम समर्थित पिट्टू सरकार ‘दोनबास क्षेत्र’ में रूस समर्थित विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध करने को तत्पर है जिसके फलस्वरूप रूस एंव यूरोपीय देशों में युद्ध प्रारंभा हो सकता है | (घ)           पाकिस्तान लगभग टूटने की कगार पर खड़ा है, पाकिस्तान देश को पुनः धार्मिक आधार पर एक जुट करने के लिए इस्लाम बनाम हिन्दू अधर्मी की अवधारण के आधार पर युद्ध की स्थिति का निर्माण करने को आतुर है | परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान इस क्षेत्र में परमाणु युद्ध का सबसे बड़ा खतरा है। हमे यह याद रखना होगा कि कोई भी युद्ध अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा | सीरिया युद्ध तुरन्त युक्रेन युद्ध में एंव तत्पश्चात चीन सागर तक फैल जायेगा।

        कोई भी युद्ध विश्व शांति ही नही अपितु समस्त विश्व को परमाणु आग में भस्म कर सकता है। अभी हाल में इस खतरे को भाँपते हुए रूस में परमाणु युद्ध से बचाव की रिहर्सल की गई थी जिसमें चार करोड़ रूस वासियों ने हिस्सा लिया था। यह अभ्यास इंगित करता है कि रूस इस युद्ध की संभावनाओं को लेकर सचेत है। हमे भी इस संभावना को हल्के में नहीं आंकना चाहिए। इस युद्ध में अपने बचाव के रास्ते निकालने के लिये भारत सरकार को सभी नागरिकों को सचैत करने का प्रयास आरंभ कर देना चाहिए। बूरे परिणाम से स्वंय की रक्षा एंव उसका उपाय शांति की सर्वोत्तम दवाई है।

                                लेखक :- श्री व्ही. के शर्मा

                                     रिटायर्ड स्पेशल डायरेक्टर जनरल

                          सेन्ट्रल पी.डब्ल्यू.डी

 

 

 

 

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