Home » National News » शिवराज के भविष्य की राजनीति की राह??

कांग्रेस ने व्यापंम घोटाले पर अबतक मिस्टर क्लीन माने जाते रहे शिवराज सिंह चौहान पर जोरदार राजनीतिक हमला बोल दिया है. कांग्रेस के आला नेताओं ने प्रधामनंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट Modi & ShivRaajकर शिवराज पर गाज गिराने की गुजारिश की है. मोदी से मिलने वाले नेताओं के कद का अनुमान इस सूची से ही कर लीजिए : दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, कपिल सिब्बल, ज्योतिरादित्य सिंधिया. इन नेताओं ने बुधवार को पीएम को कथित रूप से शिवराज के खिलाफ ठोस सबूत सौंपे हैं. अब तो यह नरेंद्र पर ही निर्भर करता है कि वे शिवराज का राज मध्यप्रदेश में रहने देंगे या नहीं.
 
भाजपा के क्षत्रप पर आंच का समय और संयोग  
 
बेहद ईमानदार, मेहनती और जनप्रिय राजनेता बताये जाने वाले शिवराज पहली बार किसी राजनीतिक मुश्किल में नहीं पडे हैं. सात आठ साल पहले वे बुरी तरह डंपर खरीद मामले में घिर गये थे. उस समय उनकी पत्नी साधना सिंह पर भी आरोपों के छिंटे पडे थे. तब मध्यप्रदेश की दिवगंत कांग्रेस नेता जमुना देवी ने शिवराज पर भोपाल से लेकर दिल्ली तक हर तरह से निशाना साधा. सचमुच वह दौर शिवराज के लिए मुश्किल भरा था. लेकिन, जमुना की घेराबंदी से वे सकुशल बाहर निकल आये थे. अब वे दूसरी बार ऐसी मुश्किल में पडे हैं.
 
शिवराज पर जब आंच आ रही है, तो ठीक उसी समय छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह पर पर भी चावल खरीद घोटाले के आरोप लग रहे हैं. कांग्रेस ने इसे मुद्दा बना लिया है. फिलहाल भाजपा के तीन ताकतवर क्षत्रपों में एकमात्र वसुंधरा राजे ही ऐसे आरोपों व घेराबंदी से बची हुई हैं. पर, क्या पता कल को विपक्ष को मुद्दा मिल जाये! भाजपा के क्षत्रपों की घेराबंदी, समय और परिस्थितियां एक अद्भुत संयोग है.
 
नरेंद्र, शिवराज व रमन
 
प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह व डॉ रमन सिंह भाजपा के अपराजेय क्षत्रप थे. लालकृष्ण आडवाणी ने हमेशा शिवराज की पीठ थपथपा कर उन्हें नरेंद्र मोदी का प्रतिद्वंद्वी या विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश की. वे पिछडे समुदाय के भी हैं, विकास पुरुष भी हैं और सहज, विनम्र भी.  आडवाणी शिवराज के काम की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते रहे. एक तरह से वे उन्हें अघोषित रूप से प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तुत कर रहे थे. हद तो तब हो गयी जब आडवाणी ने मोदी के गृह राज्य गुजरात की गांधीनगर सीट छोड शिवराज के गृह राज्य मध्यप्रदेश की भोपाल सीट से लडने की इच्छा जता दी. वे गुजरात से चुनाव लडने को लेकर सशंकित थे. उन्होंने मोदी को प्रोजेक्ट करने से पहले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ चुनाव तक इंतजार करने को कहा था, ताकि यह भ्रम टूट जाये कि अकेले मोदी ही जीत की हैट्रिक लगाने वाले शख्स नहीं हैं. शिवराज पीएम उम्मीदवार के विवाद पर एक बार कहा भी था कि भाजपा मुख्यमंत्रियों में नरेंद्र मोदी नंबर वन, डॉ रमन सिंह नंबर दो हैं, जबकि वह तो नंबर तीन हैं.
 
शिवराज की रणनीति 
 
हर आदमी की तरह शिवराज सिंह में भी कुछ खुबियां तो कुछ खामियां हैं. वे जीतना हैं, उतना दिखते नहीं हैं, यह उनकी खामी है. और वे जो हैं, वे दिखते नहीं, यह उनकी खूबी है. राजनाथ सिंह का पिछला कार्यकाल समाप्त होने के बाद संघ परिवार भाजपा के अगले अध्यक्ष की तत्परता से तलाश कर रहा था, तब शिवराज सिंह चौहान का नाम प्रमुख रूप से विचार किया गया था. पर, शिवराज उस समय राज्य को छोड भाजपा अध्यक्ष बनना नहीं चाहते थे. उसके कारण भी थे. भाजपा की उस समय की स्थिति आज के कांग्रेस जैसी ही बहुत हद तक थी. 2009 लोकसभा में हार के बाद पार्टी में कलह चरम पर था. एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी था. ऐसे में शिवराज नहीं चाहते थे कि वे एक बडे राज्य के मजबूत जननेता व मजबूत सीएम की हैसियत छोड गृह कलह में फंसी पार्टी का प्रमुख बनें. राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि शायद उन्होंने उस समय इसलिए अपनी राष्ट्रीय स्वीकार्यता को कम करने और उस पर खुद ही अंकुश लगाने के लिए बिहारियों के खिलाफ एक टिप्पणी की थी, ताकि उन्हें संघ परिवार द्वारा अध्यक्ष नहीं बनाया जाये. जानकार तो यह भी कहते हैं कि उस समय शिवराज की यह रणनीति काम कर गयी थी और वे अध्यक्ष के रूप में कांटों का ताज पहनने से बच गये थे.
 
अब क्या करेंगे शिवराज
 
शिवराज सिंह राष्ट्रीय व घरेलू दोनों मोर्चो पर मुश्किलों का सामना करते रहे हैं और बडी कुशलता से उससे बच कर निकलते रहे हैं. अब जब व्यापंम घोटाले मामले में उनके खिलाफ पीएम नरेंद्र मोदी से कांग्रेस ने शिकायत कर दी है, तो फिर वह अपनी आगामी रणनीति तय करने में एक कुशल राजनेता व रणनीतिकार की तरह लग गये हैं. उन्होंने पीएम मोदी को खुद का रोल मॉडल बता दिया है. वे कहते हैं कि उनसे उन्हें मध्यप्रदेश का विकास करने की प्रेरणा मिलती है. वे मोदी के खास रणनीतिकार अमित शाह के तारीफों की भी पुल बांधते हैं. वे साफ कहते हैं कि उन्हें राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षा नहीं है. पर, चर्चा है कि भाजपा हाइकमान उन्हें केंद्र में लाना चाहता है. अब यह उनकी प्रोन्नति होगी या पदोन्नति यह आगे का विषय है. लेकिन शिवराज का अबतक का बैकग्राउंड तो यही कहता है कि वे संगठन और सरकार दोनों जगह शानदार परफॉर्मर साबित हो सकते हैं. 

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