Home » Dharam » सौ साल पुराने मंदिर को अब 50 हजार

मंडी। सौ साल से अधिक का पुराना इतिहास रखने वाले देवी-देवता के मंदिर का अब अच्छी तरह से मरम्मत कार्य होगा। मंदिर के मरम्मत कार्य के लिए मिलने वाली राशि अब ऊंट के मुंह में जीरे के समान नहीं होगी। भाषा एवं संस्कृति विभाग ने मरम्मत राशि को अब 25 हजार से बढ़ा कर पचास हजार कर दिया है।

हिमाचल प्रदेश में कोने-कोने में देवी-देवता वास करते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों के साथ पौराणिक कथाओं में भी इसका उल्लेख मिलता है। हिमालय के आंचल में स्थित हिमाचल प्रदेश में आज भी सदियों पुराने मंदिर स्थित हैं जो शोधकर्ताओं के लिए शोध का अनूठा विषय भी बने हुए हैं। लेकिन वक्त के थपेड़ों के साथ सदियों पुराने मंदिर और देवालयों का वजूद भी मिटने के कगार पर है। जर्जर हो चुके मंदिर कभी भी गिर कर हादसे का सबब बन सकते हैं।

भाषा एवं संस्कृति विभाग पूर्व में इन मंदिरों की दशा सुधारने के लिए 25 हजार रुपये की राशि प्रदान करता था। जोकि ऊंट के मुंह में जीरे के समान रहती थी। देवसमाज से उठ रहे स्वरों को देखते हुए भाषा एवं संस्कृति विभाग ने अब इस सहायता राशि में इजाफा करते हुए इसे दोगुना यानी 50,000 रुपये कर दिया है।

सहायता राशि लेने वाले मंदिरों का भाषा एवं संस्कृति विभाग हर साल स्वयं चयन करता है। इसके लिए विभाग ने पैमाना निर्धारित किया हुआ है। विभाग उन्हीं मंदिर का चयन करता है जिसका इतिहास सौ साल से अधिक का है। इसके अलावा जिस स्थान पर देवता का मंदिर है वह जमीन भी देवता के अधीन होनी चाहिए। मंदिर की जमीन किसी अन्य व्यक्ति के नाम होगी तो उसका चयन नहीं होगा। इसके साथ साथ मंदिर की वर्तमान दशा भी चयन का आधार रहेगा। भाषा एवं संस्कृति विभाग हर साल प्रदेश में कुछ मंदिरों का चयन कर इनके मरम्मत कार्य के लिए सहायता जारी करती है।

इधर, जिला भाषा अधिकारी राजकुमार सकलानी ने सौ साल से अधिक का समृद्ध इतिहास रखने वाले ऐतिहासिक मंदिरों के मरम्मत कार्य की राशि को पचास हजार करने की पुष्टि की है।

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