Home » National News » कांग्रेस में अंदरूनी कल:

SYC New Delhi. देश के कई राज्यों में अचानक सतह पर उभरी पार्टी की अंदरूनी बगावत ने कांग्रेस नेतृत्व को दबाव में ला दिया है। इन सभी मामलों में कांग्रेस नेताओं को ज्यादा चिंता असम को लेकर है। वहां पार्टी के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावा ठोंक रहे हेमंत बिस्व सरमा ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। कहा जा Congress flagरहा है 31 और कांग्रेस के विधायक उनके साथ हैं। खुद सरमा का दावा है कि इस्तीफा देने के लिए राजभवन जाते समय उनके साथ 38 और विधायक थे। बड़ी बात यह है कि जिन अन्य कांग्रेस शासित राज्यों से बगावत की खबरें आई हैं उनमें असम में विधानसभा का चुनाव काफी दूर है। जबकि दूसरे राज्यों में सभी में छह महीने के भीतर चुनाव हैं।

असम, महाराष्ट्र, हरियाणा, पश्चिमी बंगाल से कुछ कांग्रेस विधायकों की तरफ से दिखाए जा रहे तेवरों ने कांग्रेस नेतृत्व पर चौतरफा दबाव बना रखा है। जम्मू-कश्मीर में अगले विधानसभा चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस से गठजोड़ की संभावना खत्म होने के आसार ने कांग्रेस को वैसे ही तकलीफ में डाल रखा था। प्रदेश के पूर्व सांसद लाल सिंह ने सोमवार को कांग्रेस छोड़ने का एलान कर इस तकलीफ को बढ़ाने का काम किया है। 

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेता एके एंटनी को राज्यों में उठ रहे असंतोष से निपटने की जिम्मेदारी दी है। रविवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, प्रदेश अध्यक्ष माणिक राव ठाकरे और सुशील कुमार शिंदे ने सोनिया गांधी और एके एंटनी से अलग-अलग मुलाकात की थी। इन्होंने नारायण राणे के बगावती तेवरों और इससे पैदा हुए हालात पर विचार विमर्श किया। सोनिया गांधी की दो टूक राय थी कि नारायण राणे अगर मुख्यमंत्री बनने की जिद पकड़े हैं तो इसमें कुछ नहीं किया जा सकता। आलाकमान के फैसले से असंतुष्ट नारायण राणे ने महाराष्ट्र सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा देकर सोमवार को बगावत का बिगुल बजा दिया।

महाराष्ट्र की तरह ही असम में तरुण गोगोई के बाद कांग्रेस के सबसे मजबूत नेता माने जाने वाले हेमंत बिस्व सरमा ने भी मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। वे असम के शिक्षा मंत्री है। कहा जा रहा है कि उनके समर्थक विधायक भी देर सवेर इस्तीफा दे सकते हैं। असम में समस्या मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर है। फर्क बस यह है कि वहां अभी चुनाव में काफी देर है। उधर, महाराष्ट्र में सिर्फ दो महीने बाद चुनाव हैं और राणे चाहते हैं कि चुनाव में उन्हें कांग्रेस के मुख्यमंत्री के पद के दावेदार के रूप में पेश किया जाए।

कांग्रेस का यह भी मानना है कि सोमवार को एक साथ जो कई राज्यों से बगावत की खबरें आ रही हैं उनके पीछे भाजपा की कूटनीति और उसका दबाव काम कर रहा है। क्योंकि सोमवार को ही हरियाणा के वरिष्ठ नेता बीरेंद्र सिंह ने बाकायदा संसद परिसर में कई टीवी चैनलों के सामने जाकर कहा कि वे भूपेंद्र सिंह हुड्डा की अगुआई में प्रदेश में चुनाव नहीं लड़ने जा रहे हैं। हरियाणा में भी महाराष्ट्र के साथ चुनाव होना है। कहा यह भी जा रहा है कि बीरेंद्र सिंह ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिलने का समय मांगा है। इन राज्यों के अलावा पश्चिम बंगाल की खबर ने भी कांग्रेस नेतृत्व को हिला दिया है। वहां सोमवार को हुई तृणमूल कांग्रेस की रैली  में कांग्रेस के भी तीन विधायक शामिल थे।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि यह सब पार्टी नेतृत्व के ढीले रवैये की वजह से हो रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी दिशाहीन दिखाई दे रही है। इस मामले में ज्यादातर नेता राहुल गांधी की तरफ उंगली उठा रहे हैं। एक अन्य नेता का कहना था चुनाव के बाद अभी तक पार्टी महासचिवों की बैठक तक नहीं बुलाई गई। उनका यह भी कहना था कि आज हर जगह से बगावत की खबरें आ रही है और राहुल गांधी पार्टी की अनुसूचित जाति/जनजाति समिति के साथ बैठक कर रहे हैं।

हालांकि पार्टी के एक महासचिव का यह भी कहना है कि कांग्रेस ने यह दौर 1977 और 1989 में भी देखा है। चुनावी हार के बाद कई मौकापरस्त पार्टी छोड़कर भागते हैं। उनका कहना था कि नारायण राणे हो या कोई अन्य नेता उन्हें किसी ने न तो पार्टी में बुलाया और न ही वे जाना चाहते हैं तो कोई रोक सकता है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी ने विभिन्न राज्यों में कांग्रेस के भीतर उठे इस तरह के असंतोष पर पूछे सवालों के जवाब में कहा कि पार्टी में इस समय दिक्कतें हैं। पर उन्होंने इसके लिए निजी महत्त्वाकांक्षाओं को जिम्मेदारी ठहराया।

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